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75 दिनों से चलने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे का हुआ गरिमामय समापन

बस्तर । छत्तीसगढ़ का बस्तर सिर्फ नक्सल घटनाओं के लिए नहीं बल्कि यहां की कला संस्कृति के लिए भी प्रसिद्ध है। इनमें से एक है बस्तर का ऐतिहासिक दशहरा। सबसे लंबे समय तक चलने वाले (75 दिवसीय) विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरे का समापन मंगलवार को माता मावली की भावभीनी विदाई के साथ हो गया। परंपरा अनुसार बस्तर संभाग के 84 परगना और सीमावर्ती राज्यों से आए 450 से अधिक देवी देवताओं को कुटुंब जात्रा के बाद ससम्मान विदाई दी गई। 

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बस्तर दशहरे की शुरुआत पाठ जात्रा विधान के साथ 8 अगस्त से हुई थी। अलग-अलग रस्मों के साथ कार्यक्रम विधि-विधान से संपन्न कराया गया। बस्तर का यह रियासतकालीन परंपरा 620 वर्षों से भी अधिक पुराना बताया जाता है। विधान के तहत मंगलवार को समापन कार्यक्रम था। सुबह से देर शाम तक उत्साह का वातावरण रहा। सड़क पर आकर्षक रंगोली भी सजाई गई। 

दंतेश्वरी मंदिर से प्रगति पथ तक  जगह-जगह विशाल जनसमुदाय ने माता मावली की भावभीनी विदाई दी | विदाई के दौरान भक्तों ने माता मावली के डोली पर फूल बरसाये और पूजा अर्चना कर सुख समृद्धि का आशीर्वाद मांगा। विदाई रस्म के दौरान पुलिस जवानों ने हर्ष फायरिंग भी की। इस मौके पर विभिन्न समाजों के लोग माईजी पर अपनी श्रद्धा व्यक्त करने बड़ी संख्या में पहुंचे। बस्तर दशहरा के अंतिम रस्म में राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव, दशहरा समिति के अध्यक्ष सांसद दीपक बैज सहित मांझी, चालकी और प्रशासनिक अमला मौजूद रहा।

माता की विदाई पर श्रद्धालुओं के छलके आंसू
मावली माता की विदाई के दौरान बड़ी संख्या में मौजूद श्रद्धालुओं की आंखों से आंसू छलक पड़े। एक बेटी की तरह बस्तरवासियों ने मावली माता को विदाई दी। लगभग दो किलोमीटर तक की यात्रा में माता पर श्रद्धालु पुष्प वर्षा करते रहे।