20 लाख के गहने पहनकर बेचते हैं पान:छोटी सी थड़ी पर सोने का हार-कड़ा पहनकर बैठते, बोले- शौक बड़ी चीज
बीकानेर पश्चिमी राजस्थान का अनूठा शहर है। लंबा-चौड़ा रेगिस्तान, हजार हवेलियां, भुजिया-पापड़, रस्सगुल्लों और रंग बिरंगी संस्कृति के साथ ही इस शहर की पहचान है। इस शहर आज 535वां स्थापना दिवस है। धुन के पक्के यहां के निवासी कुछ न कुछ ऐसा करते हैं कि जैसा दुनियां में शायद ही कहीं होता हो।

हम बीकानेर के ऐसे ही 3 अनोखे लोगों के बारे में बता रहे हैं। पहले जो 20 लाख के सोने के गहने पहनकर थड़ी पर पान बेचते हैं। दूसरे जिनकी मूछें 32 फीट लंबी हैं। वहीं, तीसरे के पास करोड़ों साल पुराने फॉसिल्स (जीवाश्म) मौजूद हैं।
बीस लाख के गहने पहनकर लगाते हैं पान
बीकानेर में कोटगेट क्षेत्र में थड़ीनुमा दुकान पर बीस लाख रुपए के गहने पहना एक शख्स पान लगाता नजर आता है। ये शख्स हैं फूलसा। जो बीकानेर में अपने पान के साथ गोल्ड के लिए भी फेमस हैं। फूलचंद सेवग यानी फूलसा (62) को जवानी से ही सोने के आभूषण पहनने का शौक है। सामान्य पान की दुकान होने के बाद भी उन्होंने अपने शौक पूरे करने के लिए कभी समझौता नहीं किया। उनके कान में हर वक्त लाखों रुपए से ज्यादा के कर्णफूल लटके रहते हैं। सोने का हार भी पहनते हैं। हाथ में भारी भरकम सोने का कड़ा पहनकर पान पर चूना और कत्थ लगाते हैं। वो बताते हैं कि इनकी कीमत वैसे तो बीस लाख रुपए के आसपास है, लेकिन शौक बड़ी चीज है। इसलिए कीमत मायने नहीं रखती।

72 साल पुरानी दुकान
फूलसा बताते हैं कि उनकी दूकान करीब 72 साल पुरानी दुकान है, जहां हर आम और खास पान खाते रहे हैं। मध्यप्रदेश के मंत्री जूदेव जब भी बीकानेर आते तब यहां पान जरूरत खाते थे। बीकानेर के आने पर पूर्व उप राष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत को भी उनके यहां का पान परोसा गया था। आज भी उनकी दुकान से पान बनवाकर लोग रेल व बस से राजस्थान के कई शहरों व दिल्ली तक भेजते हैं।

ये एक आकर्षण, शुभ भी है
फूलसा बताते हैं कि बड़ी संख्या में लोग यहां सिर्फ इसलिए पान खाने आते हैं कि फूलसा को देखना है। उनके साथ फोटो लेना है। लोग पान खाते हैं, सेल्फी लेते हैं। वो कहते हैं कि सोना मेरे लिए शुभ है। जब भी इन्हें पहनकर कोई काम करता हूं तो अच्छा होता है।
बचपन से पान की दुकान
फूलसा बताते हैं कि बचपन से वो पिताजी की पान की दुकान पर काम करते रहे हैं। धीरे धीरे उनकी दुकान मूलसा फूलसा पान के रूप में फेमस हो गई। वो बीस साल की उम्र से ही सोने के आभूषण पहनने का शौक रखते हैं जो आज तक कायम है।

32 फीट लंबी है इनकी मूंछें
जैसलमेर के करणाराम भील अपनी मूंछों के लिए देश और दुनिया में पहचान रखते थे। उनकी मूंछ एक तरफ से आठ फीट लंबी थी, लेकिन बीकानेर के गिरधर व्यास (64) की मूंछ एक तरफ से ही करणाराम भील से डबल सोलह फीट लंबी है। दोनों तरफ की मूंछें 32 फीट लंबी हैं। करणाराम को अपना आदर्श मानने वाले गिरधर व्यास अपनी मूंछों को बच्चों से ज्यादा प्यार करते हैं।
नवजात बच्चों की तरह उनका ख्याल रखते हैं। हजारों रुपए हर महीने देखभाल पर खर्च कर देते हैं। वन विभाग में सामान्य ड्राइवर की नौकरी करने वाले गिरधर व्यास बताते हैं कि बीस साल का था, तभी से मूंछों से प्यार हो गया। आज तक मूंछे काटी नहीं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई, मेरी मूंछों की लंबाई भी बढ़ती गई। आज एक तरफ की मूंछ करीब सोलह फीट है।
ऐसे करते हैं सार संभाल

अपनी मूंछों को संभालकर रखने के लिए गिरधर व्यास काली मिर्च, नींबू व दही से लेप करते हैं। इससे मूंछों के बाल खराब नहीं होते। व्यास साल में एक बार गर्म पानी में डिटोल डालकर मूंछों को धोते हैं। मूंछों को सुखाने के लिए सूती कपड़े में बांधते हैं। साथ ही गर्म पानी की भांप देते हैं।

छाती से लगाकर सोते हैं
रात को सोते समय गिरधर अपनी मूंछों को रखने के लिए थैली का उपयोग करते हैं। ये थैली वो गले में डालकर उसमें मूंछों को रख लेते हैं। थैली छाती पर रहती है। रातभर इसे संभालते रहते हैं। ठीक वैसे ही जैसे नवजात बच्चे को मां संभालती रहती है। रिटायर हो चुके गिरधर बीकानेर के ऊंट उत्सव सहित अनेक आयोजनों की शान है। हजारों पर्यटक बीकानेर आने पर उनके साथ फोटो खिचंवाते हैं।
फॉरेस्ट में ड्राइवर रहे
गिरधर व्यास फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में ड्राइवर के रूप् में काम करते थे। कुछ साल पहले रिटायर हो गए। इसके बाद से बीकानेर ऊंट उत्सव में हर बार उन्हें पुरस्कार मिलता रहा है। उनकी पहचान एक रौबीले के रूप में बन गई है।
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इन्होंने ढूंढी हजारों करोड़ साल पुरानी सभ्यता
बीकानेर के नृसिंह किराडू उर्फ मनोहर (71) को फॉसिल्स (जीवाश्म) एकत्र करने का ऐसा शोक चढ़ा कि अपने घर में ही म्यूजियम बना दिया। वो बताते हैं कि उनके पास करीब बीस हजार फॉसिल्स थे, जिसमें काफी उन्होंने रिसर्चर्स को बांट दिए। जोधपुर के विश्वविद्यालय को, बीकानेर के डूंगर कॉलेज के साथ ही नई दिल्ली के कई रिसर्च पर्सन उनसे फॉसिल्स ले गए हैं।
पांच हजार करोड़ साल पहले का सच
किराडू के इन्हीं फॉसिल्स का जब डूंगर कॉलेज के बॉटनी लेक्चरर डॉ. राकेश हर्ष ने अध्ययन किया तो इनकी उम्र करीब पांच हजार करोड़ साल से ग्यारह हजार करोड़ साल पुरानी निकली। डॉ. हर्ष ने तकनीकी रूप से इनकी उम्र का पता लगाया।

छिपकली हो गई पत्थर
उनके पास एक जीवाश्म ऐसा भी है जिसमें पेड़ की टहनी पर हजारों साल पहले की छिपकली नजर आती है। ये छिपकली अब पत्थर हो गई। किराडू बताते हैं कि तब कुछ ऐसा हुआ है कि छिपकली पेड़ पर थी और अचानक से सब कुछ मिट्टी में दब गया। तब से अब तक छिपकली का शव वैसा का वैसा पड़ा रहा। जीवाश्म देखने पर छिपकली साफ नजर आती है।
इतना ही नहीं पेड़ की पत्तियां पत्थर पर पड़ी पड़ी ऐसे चिपक गई कि अब उतरती नहीं। जिस पत्थर पर ये चिपकी थी, उसे साबुन से धोने पर भी परत उतरती नहीं है। इसी तरह पानी में पाए जाने वाले जानवर भी उन्हें बीकानेर शहर के आसपास मिले। जिसमें घोंघा, शीप जैसे अनेक आइटम है, जाे बताते हैं क यहां कभी सरस्वती नदियां बहती थी।
पुरातत्व विभाग में काम करते थे किराडू
नृसिंह किराडू (मनोहर) पुरातत्व विभाग में काम करते थे। वो मूल रूप से पहलवान हैं और बीकानेर में व्यायामशाला संचालन करते हैं। इस व्यायामशाला के एक हिस्से में ही उन्होंने फॉसिल्स के लिए स्थान बना दिया। उन्होंने कई सालों तक हर रोज दो घंटे इसी काम को समर्पित किए। सरकार ने उन्हें इस अनूठे काम के लिए राज्य स्तर पर सम्मानित किया।