भीलवाड़ा। उदयपुर संभाग के भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ जिले की सीमा पर स्थित प्रमुख शक्ति पीठ जोगणियां माताजी मंदिर को लेकर एक अजीब मान्यता है. बताया जाता है कि इस मंदिर के प्रति चोर-डाकुओं में बड़ी आस्था है। इस मंदिर के पेड़ पर आपको कई हथकड़ियां लटकी हुई दिखाई देगी। बताया जाता है जब कोई चोर या डाकू जेल की सजा पूरी करते आता है या जेल तोड़कर भाग करके आता तो वह मंदिर में हथकड़ी भेंट करता है। यहां हथकड़ी भेंट करने के बाद वह दोबारा अपराध नहीं करने का संकल्प भी लेता है. पिछले दिनों यहां किसी ने जेल का स्ट्रक्चर भेंट किया था।


लोहे से बने इस जेल के स्ट्रक्चर में उसका दरवाजा टूटा हुआ है। इसको देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि संभवतया कोई कैदी जेल तोड़कर आया था।मन की मुराद पूरी होने के बाद उसने जेल का यह लोहे का बना स्ट्रक्चर मंदिर में भेंट किया है। मंदिर में हथकड़ी चढ़ाने आने वाले लोग गुप्त तरीके से यहां आते हैं और हथकड़ी टांग कर चले जाते हैं. सार्वजनिक रूप से अभी तक किसी ने ऐसा किसी को करते हुए नहीं देखा है।
अपराधी अपराध के दलदल से निकलने का संकल्प भी लेते हैं
बेगूं क्षेत्र में स्थित इस मंदिर से जुड़े लोगों और स्थानीय बाशिंदों के मुताबिक यह सिलसिला काफी बरसों से चला आ रहा है। बताया जाता है कि यहां आकर अपराधी अपराध के दलदल से निकलने का संकल्प भी लेते हैं। हालांकि जाहिरा तौर पर इसका कोई साक्ष्य किसी के पास नहीं है लेकिन प्रचलित कहानियों के अनुसार ऐसा वास्तव में होता रहा है।
क्या है यहाँ की वास्तविक कहानी?
बरसों पहले घने जंगल से घिरा था यह मंदिर
दरअसल जोगणियां माता मंदिर बरसों पहले घने जंगल से घिरा हुआ था। उस समय यह चोर और डाकुओं का आश्रय स्थल रहा है। उनकी इस मंदिर में प्रति गहरी आस्था थी। यही वजह बताई जाती है कि जब वे पकड़े जाते और उन्हें जेल हो जाती थी तो वे वहां से आने के बाद यहां हथकड़ी चढ़ाते थे।यह बात दीगर की वे सजा पूरी करते आते या जेल से भाग कर या पुलिस की गिरफ्त से फरार होकर आते. लेकिन वे आते थे सीधे यहीं पर. अपनी मुराद पूरी होने के कारण हाथों में लगी हथकड़ियां खोल कर जोगणिया माताजी के मंदिर में चढ़ा देते।
पहले यहां पशु बलि भी दी जाती थी
बताया जाता है कि पहले यहां लोग मन्नतें पूरी होने पर पशु बलि भी देते थे और शराब भी चढ़ाते थे। लेकिन बाद में धीरे-धीरे इसका विरोध होने लगा।. फिर इसको बंद करने को लेकर आंदोलन हुआ. उसके बाद यहां पर पशु बलि को बंद कर दिया गया। स्थानीय लोगों के अनुसार वर्ष 1974 में जन-जन की आस्था के केंद्र इस जोगणियां माताजी में पशु बलि को पूरी तरह से बंद कर दिया गया था।